HAPPY HOLI

4 03 2015

HAPPY HOLI





‘बेपरवाह’

2 03 2015

Avinash 'Beparwah'

ख़ामोश सड़क थी और झमाझम बारिश

मैं भींगकर आज

कपकपातीं हाड़ लेकर सड़क पर टहलता रहा |

कुछ पेड़ पर मुस्कुराते, कुछ सड़क पर बिखड़े

पलास और सेमल के फूल,

मुझे याद आया वो तेरी अठखेलियाँ

तेरा मुस्कुराना, मुझसे लिपट जाना

एक हवा के झोकें में तेरा आहट पाया |

तभी पैर फिसला, अभी पैर फिसला

कपकपातीं हाड़ लेकर सड़क पर संभलता रहा |

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जब बारिश की बूंदे होठों को छूती,

मैं तुझे सोचकर मुस्कुराता रहा |

ऋतुराज संग पाया सावन की खुशबू ,

‘बेपरवाह’ भी देखो करता खयालों की परवाह,

शब्दों को पिरोकर भावनाएँ सजाता रहा |

अभी सर्दी लग गयी

एक चाय बस पिला दे,

दिल में जो तेरे, शिकवा है मिटा दे |

बस तेरी ही हमदम,

बेपरवाह को परवाह,

मैं मासूम नादाँ,

जो महसूस करता, कभी तेरी मोहब्बत

तो ये दिन ना आते, ना ऐसी राते ही होती,

जो बारिश भी होता तो साथ में टहलता,

सर्दी भी लगती तो दोनों को लगती,

‘बेपरवाह’ भी होता, परवाह भी होती |

मैं ख्यालों में खोया चलता रहा-

ख़ामोश सड़क थी और झमाझम बारिश

मैं भींगकर आज

कपकपातीं हाड़ लेकर सड़क पर टहलता रहा |

© अविनाश ‘बेपरवाह’





अनिश्चितताओं का खेल है जिन्दगी

8 01 2015

avi

हार-जित से तो यूँ हीं बदनाम है जिन्दगी

दरअसल, अनिश्चितताओं का खेल है जिन्दगी |

जब तक सांस है, तुझमे जद है,

सवार लो जिन्दगी |

न जाने कब शमशान हो जिन्दगी |

हँस लो, मुस्कुरा लो…..

ढूँढ लो हर ख़ुशी |

क्या पता कब खाक हो जिन्दगी |

क्या फ़कीरी, क्या अमीरी

क्या इबादत, क्या तिजारत,

मौत के घर बेजुबाँ है जिन्दगी |

नेक बन नेकी कर |

यहाँ न गैर न अपना कोई |

मत कर कोई अहं,

सोच भला, कर भला, बसुधैव कुटुम्बकम !

इंसान ही रहूँ न आये कभी दरिंदगी,

सुकून से मौत की बस है बंदगी |

कभी जश्न, कभी आह

कितने अक्स तेरी जिन्दगी !

वक़्त की जुबाँ,

वक़्त से ख़ामोश,

क्या अदा जिन्दगी !

हार-जित से तो यूँ हीं बदनाम है जिन्दगी

दरअसल, अनिश्चितताओं का खेल है जिन्दगी |

©अविनाश कुमार (ak25avi@gmail.com, 8051997288)





*****

24 01 2014

avi





बढ़ता चल….!!

24 01 2014

मैंने हद की हद देखी है…
जुनुने-इश्क की सरहद देखी है |
जो डूबकर निकला दरिया से,
अब दरिया की कद देखी है…||

जो उछलती मौजों पर,
कश्ती अपनी संभाली थी,
मत पूछ ! कितना कठिन था वो !
पर, साहिल को पाने की जद देखी है ||

कभी कीचड़, कभी धूल-गर्द,
कभी तपन बहुत, कभी बहुत सर्द |
यादें हैं-
वो शिद्दत से गुजरी भयानक रातों की,
जब- अश्क नज़र और हमसफ़र दर्द !
फ़कत हयात का गद्य नहीं, मैंने छंद भरे पद देखी है ||

दूर है, चाँद भी खूब है |
अदा है, नशा है, नखरें हैं ||
कभी मिलकर तो देखो….
बेजान है…!!
मैंने चाँद की बंजर जमीं देखी है ||

चल उठ, अब ख़्वाब नहीं, ख्याल भी कर !
अनजान पथ है, अजनबी पथिक हो तुम !
क्षीतिज को छू, आसमान पर चल !
मत देख इधर-उधर !
वक़्त के संग क़दम मिला कर चल |
है मंजिले-मक़सूद करीब –
अब डर क्या, फ़िकर क्या ?
बढ़ता चल, चलता चल….
बढ़ता चल…चलता चल…||





3) कुछ पाने की…. तुम्हें पाने की…

24 01 2014

पुराने खंडहर की टूटी कीवार से झांका,
तो देखा कुछ बिखरी हुई किताबे हैं |
सुनी है दीवार में गड़ी खूटी,
खाली है वो लकड़ी का बक्सा,
वो मेरी पुरानी चौकी,
सिर्फ मकरी के जाले हैं |
कुछ ढूंढा, एक पुरानी तस्वीर मिली |
कुछ यादें,
कुछ कही कुछ अनकही बातें,
कुछ सुलझी कुछ उलझी जज्बातें,
कुछ ख्वाब फटे-पुरानें बिखरें डायरी के पन्नों में,
कोई उम्मीद, एक हौसला जीनें की,
तुम्हे पानें, तुम्हें छूने की,
अब जितने की, मुस्कुरानें की,
फिर से वो उजरे आँगन को बसानें की,
वो सुकून भरे सिरहानें की,
अब तमन्ना नहीँ, एक निश्चय |
अब आरजू नहीं, एक परिचय |
कुछ पाने की…. तुम्हें पाने की…
जीने की….जितने की….मुस्कुरानें की…. ||





नज़रे न होती फ़रेबी अगर जान लेते

24 01 2014

1)      फ़ासले बढ़ गये दरमियाँ

जो एक पल को खुद को बेनक़ाब किया मैंने….||

 

2)      थोड़ा सा फ़र्क है जानने और पहचानने में,

अगर पहचान होती तो मैं अजनबी नहीं होता….नज़रे न होती फ़रेबी अगर जान लेते…|| 








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