जिन्दगी शायद इसी भाग-दौड़ का नाम है——-अविनाश ‘बेपरवाह’

17 04 2015

avi

ना ग़मों का बादल हटा पाया, ना ही खुशियों की बारिश ला पाया,

पुराने चिथड़े की तरह जिन्दगी दरकती रही,

कश्मकश में मैं, कभी सिलता रहा, कभी ढकता रहा |

फ़क़त फिक्र-ए-ख़ुराक में उलझा ‘बेपरवाह’ वक़्त गुजर जाता है,
याद तुम भी आते हो, याद अपना घर भी आता है,
पर सपनों की चाहत, अपनों की मुहब्बत को बेअसर कर जाती है |
जब हर शाम थक कर घर लौटता हूँ, सोचता हूँ तुझसे आज जी भर के बात करूंगा,
पर ना जाने कब आँख लग जाती है और फिर सूरज नज़र  आता है |
जिन्दगी शायद इसी भाग-दौड़ का नाम है,
जिस दिन ठहर जाता है, इन्सान गुजर जाता  है |
(c) अविनाश ‘बेपरवाह’





कुछ शेर ….बेपरवाह कलम से…..

30 03 2015

‘बेपरवाह’ धड़कने ठहर सी गयी है ,

जो मेरे कदमो की आहट उनके अहाते में हुई |

(C) अविनाश ‘बेपरवाह’

‘बेपरवाह’ नज़र से नज़र मत मिलाना,

नज़र जो लग गयी, नज़ारे बदल जायेंगे |

(C) अविनाश ‘बेपरवाह’

पूछा किसी ने ‘बेपरवाह’ मुस्कुराहटों का वजह तो बता दो,

मैंने कहा पराई ख़ुशी है, जिसकी हँसी में सब राज छुपा है|

(C) अविनाश ‘बेपरवाह’

‘बेपरवाह’ हुश्न से दूर रहना, इसके जलवे बहुत है,

आशियाँ उजरे बहुत है, रिश्ते बिखड़े बहुत हैं,

इतिहास पलट कर देखो, इसके बलवे बहुत हैं |

(C) अविनाश ‘बेपरवाह’

मासूमियत है ख़ामोश तस्वीर में | ‘बेपरवाह’ काशिस में मदहोश मत होना ,

होठों के चिलमन में हसीना अंगार लिए बैठी है |

(C) अविनाश ‘बेपरवाह’





कल रात भर …………………‘बेपरवाह’

30 03 2015

मैं रात भर जन्नत में था

थी तलब जिनसे रूबरू कि,

थी आरजू जिनसे गुप्तगू कि,

वो चाँद कल मेरे आँगन में था |

मैं रात भर जन्नत में था |

मासूम चेहरा, अधरों पर मुस्कान लिए,

झील सी आँखें, सुर्ख होंठ,

घनेरी जुल्फ, यौवन में उफ़ान लिए ,

वो प्रतिरूप अप्सरा कि,

नूर इस धरा की |

वो खनकती आवाज उसकी,

मेरे अंतर्मन को छेड़ती,

कभी इठलाती, कभी इतराती,

मुझे गुदगुदाती रही |

मैं स्वप्नों के आलिंगन में,

उसके मादक हुस्न के बंधन का

रोम-रोम में एहसास किया ,

‘बेपरवाह’ कल रात भर प्यार किया |

सच, उसे पाना एक मन्नत सा था |

मैं कल रात भर ………………….

© अविनाश ‘बेपरवाह’





HAPPY HOLI

4 03 2015

HAPPY HOLI





‘बेपरवाह’

2 03 2015

Avinash 'Beparwah'

ख़ामोश सड़क थी और झमाझम बारिश

मैं भींगकर आज

कपकपातीं हाड़ लेकर सड़क पर टहलता रहा |

कुछ पेड़ पर मुस्कुराते, कुछ सड़क पर बिखड़े

पलास और सेमल के फूल,

मुझे याद आया वो तेरी अठखेलियाँ

तेरा मुस्कुराना, मुझसे लिपट जाना

एक हवा के झोकें में तेरा आहट पाया |

तभी पैर फिसला, अभी पैर फिसला

कपकपातीं हाड़ लेकर सड़क पर संभलता रहा |

am

जब बारिश की बूंदे होठों को छूती,

मैं तुझे सोचकर मुस्कुराता रहा |

ऋतुराज संग पाया सावन की खुशबू ,

‘बेपरवाह’ भी देखो करता खयालों की परवाह,

शब्दों को पिरोकर भावनाएँ सजाता रहा |

अभी सर्दी लग गयी

एक चाय बस पिला दे,

दिल में जो तेरे, शिकवा है मिटा दे |

बस तेरी ही हमदम,

बेपरवाह को परवाह,

मैं मासूम नादाँ,

जो महसूस करता, कभी तेरी मोहब्बत

तो ये दिन ना आते, ना ऐसी राते ही होती,

जो बारिश भी होता तो साथ में टहलता,

सर्दी भी लगती तो दोनों को लगती,

‘बेपरवाह’ भी होता, परवाह भी होती |

मैं ख्यालों में खोया चलता रहा-

ख़ामोश सड़क थी और झमाझम बारिश

मैं भींगकर आज

कपकपातीं हाड़ लेकर सड़क पर टहलता रहा |

© अविनाश ‘बेपरवाह’





अनिश्चितताओं का खेल है जिन्दगी

8 01 2015

avi

हार-जित से तो यूँ हीं बदनाम है जिन्दगी

दरअसल, अनिश्चितताओं का खेल है जिन्दगी |

जब तक सांस है, तुझमे जद है,

सवार लो जिन्दगी |

न जाने कब शमशान हो जिन्दगी |

हँस लो, मुस्कुरा लो…..

ढूँढ लो हर ख़ुशी |

क्या पता कब खाक हो जिन्दगी |

क्या फ़कीरी, क्या अमीरी

क्या इबादत, क्या तिजारत,

मौत के घर बेजुबाँ है जिन्दगी |

नेक बन नेकी कर |

यहाँ न गैर न अपना कोई |

मत कर कोई अहं,

सोच भला, कर भला, बसुधैव कुटुम्बकम !

इंसान ही रहूँ न आये कभी दरिंदगी,

सुकून से मौत की बस है बंदगी |

कभी जश्न, कभी आह

कितने अक्स तेरी जिन्दगी !

वक़्त की जुबाँ,

वक़्त से ख़ामोश,

क्या अदा जिन्दगी !

हार-जित से तो यूँ हीं बदनाम है जिन्दगी

दरअसल, अनिश्चितताओं का खेल है जिन्दगी |

©अविनाश कुमार (ak25avi@gmail.com, 8051997288)





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24 01 2014

avi








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