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22 11 2016

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Regards

A





मैं अग्रसर जनक आपके अनुभव और वक्तव्य पर

2 12 2015

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फिर से वही उलझन, वही उधेड़बुन

किंकर्तव्यविमूढ़ अपने कर्तब्य पथ पर |

मस्तिष्क में हलचल, मन विस्मित

‘लेकिन…किन्तु…परन्तु’

मैं अग्रसर जनक आपके अनुभव और वक्तव्य पर |

मूल्यहीन समाज मूक-बधिर

अर्थ विचार, अर्थ व्यव्हार,

अहम् युद्ध, विकृत संस्कार |

मैं अबोध अज्ञान निस्वार्थ अभिमन्यु,

ये कौरव चक्रव्यूह का सातवाँ द्वार |

‘बेपरवाह’ मन विकल विह्वल

पग-पग दुत्कार, हर क्षण संघर्ष,

ना दृढ़निश्चय ना आत्मविश्वास

परंच, मैं अग्रसर जनक गन्तव्य पर |

कुछ उलझन, कुछ उधेड़बुन

किंकर्तव्यविमूढ़ अपने कर्तब्य पथ पर |

थाम ऊँगली जनक बाट दिखाओ

सत्य क्या है? सन्मार्ग बताओ…

पुनः मंत्रणा आपके मंतव्य पर

मैं अग्रसर जनक आपके अनुभव और वक्तव्य पर |

 





….memories keep us alive :)

30 11 2015

beparwah

“इश्क़ में शहादत को तेरी मुस्कुराहट ही काफ़ी थी कातिल…

यूँ बेपरवाह गले लगाने की जरुरत क्या है ?”

“Ishq me shahadat ko teri muskurahat hi kafi thi katil…

Yu beparwah gale lagne ki jarurat kya hai?”

 

“रंजिश-ए-इश्क़ में यूँही बरबाद हुआ बेपरवाह

कसूर फ़क़त इतना सा था-

फिक्र हिज्र में था और जिक्र बेजुबाँ रहा…|“

“Ranjishe ishq me yuhi barbad hua beparwah,

Kasoor faqat ye tha-

Fikra hijra me thi aur jikra bejubaan rha…”

 

 

“इश्कोहलिक आवारा बेपरवाह बंजारा इश्कजादा

तुम मिले तो पूरा…बिन तेरे वाहिद आधा….. !!”

“Ishqohlic awaara beparwah banjara ishqjada

Tum mile to pura…..bin tere wahid aadha…”

 

 

“बेपरवाह तुम क्या जानो क़द्र मोहब्बत की !

दिन फिक्र में गुजरता है और रात फ़ितूर में !”

“Beparwah tum kya jano kadra mohabbat ki,

Din fikra me gujarta hai aur raat fitoor me…”

 

 

“बेपरवाह तेरी कलम की इतनी बेफ़िक्र रफ़्तार क्यूँ है ?

रंग स्याही का गहरा है या हिज्र जी रक्त में लिखावट सुर्ख है ??”

“Beparwah teri kalam ki itni befikra raftar kyu hai??

Rang syahi ka gehra hai ya hijra ki rakt me surkh hai?”

 

 

“रस्में वफ़ा में यूँ मशगूल हुए बेपरवाह,

बेवफ़ाई का हर नमूना मासूक की अदा-ए-इश्क़ लगी !”

“Rasme wfa me yu masgool hue beparwah,

Ki bewafai Ka har namuna masook ki ada-e-ishq lgi….”

 

 

© अविनाश ‘बेपरवाह’ Avinash ‘Beparwah’

 





बेपरवाह मैं बिंदास हूँ…..

15 09 2015

beparwah

कोई जख्म था दिल पर, अक्सर तकलीफ रहती थी.. फिर गुस्सा आया….दिल चिर लिया…यादों के धागों से रफ्फू किया….मरहम किया, पट्टी भी की….उस हसीं के कातिल नस्तर को, बाहर निकाल कर फेंक दिया…अब फिर से मेरा दिल जवां, पुराने नकली रकीब की फिक्र नहीं, किसी अतीत का जिक्र नहीं….अब बेपरवाह मैं बिंदास हूँ…..खुशियों का एक एहसास हूँ…..इश्क हूँ, अक्स हूँ, मर्ज हूँ, विश्वास हूँ… बेपरवाह मैं बिंदास हूँ ||





जिन्दगी शायद इसी भाग-दौड़ का नाम है——-अविनाश ‘बेपरवाह’

17 04 2015

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ना ग़मों का बादल हटा पाया, ना ही खुशियों की बारिश ला पाया,

पुराने चिथड़े की तरह जिन्दगी दरकती रही,

कश्मकश में मैं, कभी सिलता रहा, कभी ढकता रहा |

फ़क़त फिक्र-ए-ख़ुराक में उलझा ‘बेपरवाह’ वक़्त गुजर जाता है,
याद तुम भी आते हो, याद अपना घर भी आता है,
पर सपनों की चाहत, अपनों की मुहब्बत को बेअसर कर जाती है |
जब हर शाम थक कर घर लौटता हूँ, सोचता हूँ तुझसे आज जी भर के बात करूंगा,
पर ना जाने कब आँख लग जाती है और फिर सूरज नज़र  आता है |
जिन्दगी शायद इसी भाग-दौड़ का नाम है,
जिस दिन ठहर जाता है, इन्सान गुजर जाता  है |
(c) अविनाश ‘बेपरवाह’





कुछ शेर ….बेपरवाह कलम से…..

30 03 2015

‘बेपरवाह’ धड़कने ठहर सी गयी है ,

जो मेरे कदमो की आहट उनके अहाते में हुई |

(C) अविनाश ‘बेपरवाह’

‘बेपरवाह’ नज़र से नज़र मत मिलाना,

नज़र जो लग गयी, नज़ारे बदल जायेंगे |

(C) अविनाश ‘बेपरवाह’

पूछा किसी ने ‘बेपरवाह’ मुस्कुराहटों का वजह तो बता दो,

मैंने कहा पराई ख़ुशी है, जिसकी हँसी में सब राज छुपा है|

(C) अविनाश ‘बेपरवाह’

‘बेपरवाह’ हुश्न से दूर रहना, इसके जलवे बहुत है,

आशियाँ उजरे बहुत है, रिश्ते बिखड़े बहुत हैं,

इतिहास पलट कर देखो, इसके बलवे बहुत हैं |

(C) अविनाश ‘बेपरवाह’

मासूमियत है ख़ामोश तस्वीर में | ‘बेपरवाह’ काशिस में मदहोश मत होना ,

होठों के चिलमन में हसीना अंगार लिए बैठी है |

(C) अविनाश ‘बेपरवाह’





कल रात भर …………………‘बेपरवाह’

30 03 2015

मैं रात भर जन्नत में था

थी तलब जिनसे रूबरू कि,

थी आरजू जिनसे गुप्तगू कि,

वो चाँद कल मेरे आँगन में था |

मैं रात भर जन्नत में था |

मासूम चेहरा, अधरों पर मुस्कान लिए,

झील सी आँखें, सुर्ख होंठ,

घनेरी जुल्फ, यौवन में उफ़ान लिए ,

वो प्रतिरूप अप्सरा कि,

नूर इस धरा की |

वो खनकती आवाज उसकी,

मेरे अंतर्मन को छेड़ती,

कभी इठलाती, कभी इतराती,

मुझे गुदगुदाती रही |

मैं स्वप्नों के आलिंगन में,

उसके मादक हुस्न के बंधन का

रोम-रोम में एहसास किया ,

‘बेपरवाह’ कल रात भर प्यार किया |

सच, उसे पाना एक मन्नत सा था |

मैं कल रात भर ………………….

© अविनाश ‘बेपरवाह’








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