बढ़ता चल….!!

24 01 2014

मैंने हद की हद देखी है…
जुनुने-इश्क की सरहद देखी है |
जो डूबकर निकला दरिया से,
अब दरिया की कद देखी है…||

जो उछलती मौजों पर,
कश्ती अपनी संभाली थी,
मत पूछ ! कितना कठिन था वो !
पर, साहिल को पाने की जद देखी है ||

कभी कीचड़, कभी धूल-गर्द,
कभी तपन बहुत, कभी बहुत सर्द |
यादें हैं-
वो शिद्दत से गुजरी भयानक रातों की,
जब- अश्क नज़र और हमसफ़र दर्द !
फ़कत हयात का गद्य नहीं, मैंने छंद भरे पद देखी है ||

दूर है, चाँद भी खूब है |
अदा है, नशा है, नखरें हैं ||
कभी मिलकर तो देखो….
बेजान है…!!
मैंने चाँद की बंजर जमीं देखी है ||

चल उठ, अब ख़्वाब नहीं, ख्याल भी कर !
अनजान पथ है, अजनबी पथिक हो तुम !
क्षीतिज को छू, आसमान पर चल !
मत देख इधर-उधर !
वक़्त के संग क़दम मिला कर चल |
है मंजिले-मक़सूद करीब –
अब डर क्या, फ़िकर क्या ?
बढ़ता चल, चलता चल….
बढ़ता चल…चलता चल…||

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