प्रकृति का कहर

11 04 2011
दिखाई विनाश की प्रहर-
क्रुद्ध हो प्रकृति ने,
मनव के व्यवहार से।
सिहर उठा ये समाज,
प्रकृति के कहर से।
उपर उठ लहरों ने,
समेंट ली हजारों को।
पलक उठाती जबतक संसार,
डुब चुके थे कितने अरमान,
मौत के नृत्य से।
सिहर उठा ये समाज,
प्रकृति के कहर से।
कभी बाढ कभी भूकंप,
कभी सुनामी के सहारे से,
अपने जख्मों का बदला लेने,
उठ चुकी है प्रकृति।
अब कब छटेगा अंधकार मानवों के नेत्र से?
फिर सिहरेगा ये समाज,
प्रकृति के कहर से।
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